सामाजिक न्याय

एक विचार के रूप में सामाजिक न्याय (social justice) की बुनियाद सभी मनुष्यों को समान मानने के आग्रह पर आधारित है। इसके मुताबिक किसी के साथ सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पूर्वर्ग्रहों के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। हर किसी के पास इतने न्यूनतम संसाधन होने चाहिए कि वे ‘उत्तम जीवन’ की अपनी संकल्पना को धरती पर उतार पाएँ। विकसित हों या विकासशील, दोनों ही तरह के देशों में राजनीतिक सिद्धांत के दायरे में सामाजिक न्याय की इस अवधारणा और उससे जुड़ी अभिव्यक्तियों का प्रमुखता से प्रयोग किया जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसका अर्थ हमेशा सुस्पष्ट ही होता है। सिद्धांतकारों ने इस प्रत्यय का अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल किया है। व्यावहारिक राजनीति के क्षेत्र में भी, भारत जैसे देश में सामाजिक न्याय का नारा वंचित समूहों की राजनीतिक गोलबंदी का एक प्रमुख आधार रहा है। उदारतावादी मानकीय राजनीतिक सिद्धांत में उदारतावादी-समतावाद से आगे बढ़ते हुए सामाजिक न्याय के सिद्धांतीकरण में कई आयाम जुड़ते गये हैं। मसलन, अल्पसंख्यक अधिकार, बहुसंस्कृतिवाद, मूल निवासियों के अधिकार आदि। इसी तरह, नारीवाद के दायरे में स्त्रियों के अधिकारों को ले कर भी विभिन्न स्तरों पर सिद्धांतीकरण हुआ है और स्त्री-सशक्तीकरण के मुद्दों को उनके सामाजिक न्याय से जोड़ कर देखा जाने लगा है।

यद्यपि एक विचार के रूप में विभिन्न धर्मों की बुनियादी शिक्षाओं में सामाजिक न्याय के विचार को देखा जा सकता है, लेकिन अधिकांश धर्म या सम्प्रदाय जिस व्यावहारिक रूप में सामने आये या बाद में जिस तरह उनका विकास हुआ, उनमें कई तरह के ऊँच-नीच और भेदभाव जुड़ते गये। समाज-विज्ञान में सामाजिक न्याय का विचार उत्तर-ज्ञानोदय काल में सामने आया और समय के साथ अधिकाधिक परिष्कृत होता गया। क्लासिकल उदारतावाद ने मनुष्यों पर से हर तरह की पुरानी रूढ़ियों और परम्पराओं की जकड़न को ख़त्म किया और उसे अपने मर्जी के हिसाब से जीवन जीने के लिए आज़ाद किया। इसके तहत हर मुनष्य को स्वतंत्रता देने और उसके साथ समानता का व्यवहार करने पर ज़ोर ज़रूर था, लेकिन ये सारी बातें औपचारिक स्वतंत्रता या समानता तक ही सिमटी हुई थीं। बाद में उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में कई उदारतावादियों ने राज्य के हस्तक्षेप द्वारा व्यक्तियों की आर्थिक भलाई करने और उन्हें अपनी स्वतंत्रता को उपभोग करने में समर्थ बनाने की वकालत की। कई यूटोपियाई समाजवादियों ने भी एक ऐसे समाज की कल्पना की जहाँ आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक आधार पर लोगों के साथ भेदभाव न होता हो। स्पष्टतः इन सभी विचारों में सामाजिक न्याय के प्रति गहरा सरोकार था। इसके बावजूद मार्क्स ने इन सभी विचारों की आलोचना की और ज़ोर दिया कि न्याय जैसी अवधारणा की आवश्यकता पूँजीवाद के भीतर ही होती है क्योंकि इस तरह की व्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर कब्ज़ा जमाये कुछ लोग बहुसंख्यक सर्वहारा का शोषण करते हैं। उन्होंने क्रांति के माध्यम से एक ऐसी व्यवस्था कायम करने का लक्ष्य रखा जहाँ हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार काम करने और अपनी आवश्यकता के अनुसार चीज़ें हासिल करने की परिस्थितियाँ प्राप्त हों। लेकिन बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में मार्क्सवाद और उदारतावाद का जो व्यावहारिक रूप सामने आया, वह उनके आश्वासनों जैसा न हो कर विकृत था। मार्क्सवाद से प्रेरित रूसी क्रांति के कुछ वर्षों बाद ही स्तालिनवाद की सर्वसत्तावादी संरचनाएँ उभरने लगीं। वहीं उदारतावाद और पूँजीवाद ने आंतरिक जटिलताओं के कारण दुनिया को दो विश्व-युद्धों, महामंदी, फ़ासीवाद और नाज़ीवाद जैसी भीषणताओं में धकेल दिया। पूँजीवाद को संकट से उबारने के लिए पूँजीवादी देशों में क्लासिकल उदारतावादी सूत्र से लेकर कींसवादी नीतियों तक हर सम्भव उपाय अपनाने की कोशिश की गयी। इस पूरे संदर्भ में सामाजिक न्याय की बातें नेपथ्य में चली गयीं या सिर्फ़ इनका दिखावे के तौर पर प्रयोग किया गया। इसी दौर में उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ चलने वाले संघर्षों में मानव-मुक्ति और समाज के कमज़ोर तबकों के हकों आदि की बातें ज़ोरदार तरीके से उठायी गयीं। ख़ास तौर पर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सभी तबकों के लिए सामाजिक न्याय के मुद्दे पर गम्भीर बहस चली। इस बहस से ही समाज के वंचित तबकों के लिए संसद एवं नौकरियों में आरक्षण, अल्पसंख्यकों को अपनी आस्था के अनुसार अधिकार देने और अपनी भाषा का संरक्षण करने जैसे प्रावधानों पर सहमति बनी। बाद में ये सहमतियाँ भारतीय संविधान का भाग बनीं।

इसी के साथ-साथ मानकीय उदारतावादी सिद्धांत में राज्य द्वारा समाज के कुछ तबकों की भलाई या कल्याण के लिए ज़्यादा आय वाले लोगों पर टैक्स लगाने का मसला विवादास्पद बना रहा। कींस ने पूँजीवाद को मंदी से उबारने के लिए राज्य के हस्तक्षेप के ज़रिये रोज़गार पैदा करने के प्रावधानों का सुझाव दिया, लेकिन फ़्रेड्रिख़ वान हायक, मिल्टन फ़्रीडमैन और बाद में रॉबर्ट नॉज़िक जैसे विद्वानों ने आर्थिक गतिविधियों में राज्य के हस्तक्षेप की आलोचना की। इन लोगों का मानना था कि इससे व्यक्ति की स्वतंत्रता और आर्थिक आज़ादी को चोट पहुँचती है। जॉन रॉल्स ने 1971 में अपनी किताब अ थियरी ऑफ़ जस्टिस में ताकतवर दलीलें दीं आख़िर क्यों समाज के कमज़ोर तबकों की भलाई के लिए राज्य को सक्रिय हस्तक्षेप करना चाहिए। अपनी थियरी में रॉल्स शुद्ध प्रक्रियात्मक न्याय की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए वितरणमूलक न्याय के लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश करते हुए दिखाई देते हैं। अपने न्याय के सिद्धांत में उन्होंने हर किसी को समान स्वतंत्रता के अधिकार की तरफ़दारी की। इसके साथ ही भेदमूलक सिद्धांत के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि सामाजिक और आर्थिक अंतरों को इस तरह समायोजित किया जाना चाहिए कि इससे सबसे वंचित तबके को सबसे ज़्यादा फ़ायदा हो।

बाद के वर्षों में रॉल्स के सिद्धांत की कई आलोचनाएँ भी सामने आयीं, जो दरअसल सामाजिक न्याय के संदर्भ कई नये आयामों का प्रतिनिधित्व करती थीं। इस संदर्भ में समुदायवादियों और नारीवादियों की द्वारा की गयी आलोचनाओं का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। समुदायवादियों ने सामान्य तौर पर उदारतावाद और विशेष रूप से रॉल्स के सिद्धांत की इसलिए आलोचना की कि इसमें व्यक्ति की अणुवादी संकल्पना पेश किया गया है। रॉल्स जिस व्यक्ति की संकल्पना करते हैं वह अपने संदर्भ और समुदाय से पूरी तरह कटा हुआ है। बाद में, 1980 के दशक के आख़िरी वर्षों में, उदारतावादियों ने समुदायवादियों की आलोचनाओं को उदारतावाद के भीतर समायोजित करने की कोशिश की जिसके परिणामस्वरूप बहुसंस्कृतिवाद की संकल्पना सामने आयी। इसमें यह माना गया कि अल्पसंख्यक समूहों के साथ वास्तविक रूप से तभी न्याय हो सकता है, जब उन्हें अपनी संस्कृति से जुड़े विविध पहलुओं की हिफ़ाज़त करने और उन्हें सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करने की आज़ादी मिले। इसके लिए यह ज़रूरी है कि इनके सामुदायिक अधिकारों को मान्यता दी जाए। इस तरह सैद्धांतिक विमर्श के स्तर पर बहुसंस्कृतिवाद ने सामाजिक न्याय की अवधारणा में एक नया आयाम जोड़ा।

यहाँ उल्लेखनीय है कि साठ के दशक से ही पश्चिम में नारीवादी आंदोलन, नागरिक अधिकार आंदोलन, गे, लेस्बियन और ट्रांस-जेंडर आंदोलन और पर्यावरण आंदोलन आदि उभरने लगे थे। बाद के दशकों में इनका प्रसार ज़्यादा बढ़ा और इन्होंने सैद्धांतिक विमर्श को भी गहराई प्रदान की। मसलन, नारीवादियों ने उदारतावाद और रॉल्सवादी रूपरेखा की आलोचना की। अपने विश्लेषण द्वारा उन्होंने पितृसत्ता को नारीवादियों के समान हक के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट के रूप में रेखांकित किया। इसी तरह, गे, लेस्बियन और ट्रांस- जेंडर लोगों ने समाज में ‘सामान्य’ या ‘नार्मल’ की वर्चस्वी रूपरेखा पर सवाल उठाया और अपने लिए समान स्थिति की माँग की। नागरिक अधिकार आंदोलनों द्वारा पश्चिम में, ख़ास तौर पर अमेरिकी समाज में काले लोगों ने अपने लिए बराबरी की माँग की। मूल निवासियों ने भी अपने सांस्कृतिक अधिकारों की माँग करते हुए बहुत सारे आंदोलन किये हैं। बहुसंस्कृतिवादियों ने अपनी सैद्धांतिक रूपरेखा में इन सभी पहलुओं को समेटने की कोशिश की है। इन सभी पहलुओं ने सामाजिक न्याय के अर्थ में कई नये आयाम जोड़े हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विविध समूहों के लिए सामाजिक न्याय का अलग-अलग अर्थ रहा है।

असल में विकासशील समाजों में पश्चिमी समाजों की तुलना में सामाजिक न्याय ज़्यादा रैडिकल रूप में सामने आया है। मसलन, दक्षिण अफ़्रीका में अश्वेत लोगों ने रंगभेद के ख़िलाफ़ और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी के लिए ज़ोरदार संघर्ष किया। इस संघर्ष की प्रकृति अमेरिका में काले लोगों द्वारा चलाये गये संघर्ष से इस अर्थ में अलग थी कि दक्षिण अफ़्रीका में काले लोगों को ज़्यादा दमनकारी स्थिति का सामना करना पड़ रहा था। इस संदर्भ में भारत का उदाहरण भी उल्लेखनीय है। बहुसंस्कृतिवाद ने जिन सामुदायिक अधिकारों पर जोर दिया उनमें से कई अधिकार भारतीय संविधान में पहले से ही दर्ज हैं। लेकिन यहाँ सामाजिक न्याय वास्तविक राजनीति में संघर्ष का नारा बन कर उभरा। मसलन, भीमराव आम्बेडकर और उत्पीड़ित जातियों और समुदायों के कई नेता समाज के हाशिये पर पड़ी जातियों कोशिक्षित और संगठित होकर संघर्ष करते हुए अपने न्यायपूर्ण हक को हासिल करने की विरासत रच चुके थे। इसी तरह पचास और साठ के दशक में राममनोहर लोहिया ने इस बात पर जोर दिया कि पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों को एकजुट होकर सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करना चाहिए। लोहिया चाहते थे कि ये समूह एकजुट होकर सत्ता और नौकरियों में ऊँची जातियों के वर्चस्व को चुनौती दें। इस पृष्ठभूमि के साथ नब्बे के दशक के बाद सामाजिक न्याय भारतीय राजनीति का एक प्रमुख नारा बनता चला गया। इसके कारण अभी तक सत्ता से दूर रहे समूहों को सत्ता की राजनीति के केंद्र में आने का मौका मिला। ग़ौरतलब है कि भारत में भी पर्यावरण के आंदोलन चल रहे हैं। लेकिन ये लड़ाइयाँ स्थानीय समुदायों के अपने ‘जल, जंगल और जमीन’ के संघर्ष से जुड़ी हुई हैं। इसी तरह विकासशील समाजों में अल्पसंख्यक समूह भी अपने ख़िलाफ़ पूर्वग्रहों से लड़ते हुए अपने लिए ज़्यादा बेहतर सुविधाओं की माँग कर रहे हैं। इस अर्थ में सामाजिक न्याय का संघर्ष लोगों के अस्तित्व और अस्मिता से जुड़ा हुआ संघर्ष है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सामाजिक न्याय के नारे ने विभिन्न समाजों में विभिन्न तबकों को अपने लिए गरिमामय ज़िंदगी की माँग करने और उसके लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया है। सैद्धांतिक विमर्श में भी यूटोपियाई समाजवाद से लेकर वर्तमान समय तक सामाजिक न्याय में बहुत सारे आयाम जुड़ते गये हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि विकसित समाजों की तुलना में विकासशील समाजों में सामाजिक न्याय का संघर्ष बहुत जटिलताओं से घिरा रहा है। अधिकांश मौकों पर इन समाजों में लोगों को सामाजिक न्याय के संघर्ष में बहुत ज़्यादा संरचात्मक हिंसा और कई मौकों पर राज्य की हिंसा का भी सामना करना पड़ा है। लेकिन सामाजिक न्याय के लिए चलने वाले संघर्षों के कारण इन समाजों में बुनियादी बदलाव हुए हैं। कुल मिला कर समय के साथ सामाजिक न्याय के सिद्धांतीकरण में कई नये आयाम जुड़े हैं और एक संकल्पना या नारे के रूप में इसने लम्बे समय तक ख़ामोश या नेपथ्य में रहने वाले समूहों को भी अपने के लिए जागृत किया है।

Advertisements

अगर तुम एक युवा हो

ग़रीबों-मज़लूमों के नौजवान सपूतों!

उन्‍हें कहने दो कि क्रांतियाँ मर गयीं

जिनका स्‍वर्ग है इसी व्‍यवस्‍था के भीतर

तुम्‍हें तो इस नर्क से बाहर

निकलने के लिए

बन्‍द दरवाजों को तोड़ना ही होगा,

आवाज़ उठानी ही होगी

इस निजामें कोहना के खिलाफ।

यदि तुम चाहते हो

आज़ादी, न्‍याय, सच्‍चाई, स्‍वाभिमान

और सुन्‍दरता से भरी जिन्‍दगी

तो तुम्‍हें उठाना ही होगा

नये इंकलाब का परचम फिर से।

उन्‍हें करने दो ‘इतिहास के अन्‍त’

और ‘विचारधारा के अन्‍त’ की अन्‍तहीन बकवास।

उन्‍हें पीने दो पेप्‍सी और कोक और

थिरकने दो माइकल जैक्‍सन की

उन्‍मादी धुनों पर।

तुम गाओ

प्रकृति की लय पर जिन्‍दगी के गीत।

तुम पसीने और खून और

मिट्टी और रोशनी की बातें करो।

तुम बगावत की धुनें रचो।

तुम इतिहास के रंगमंच पर

एक नये महाकाव्‍यात्‍मक नाटक की

तैयारी करो।

तुम उठो,

एक प्रबल वेगवाही

प्रचण्‍ड झंझावात बन जाओ।

___________________

अगर तुम युवा हो
स्‍मृतियों से कहो

पत्‍थर के ताबूत से बाहर आने को ।

गिर जाने दो

पीले पड़ चुके पत्‍तों को,

उन्‍हें गिरना ही है ।

बिसुरो मत,

न ही ढिंढोरा पीटो

यदि दिल तुम्‍हारा सचमुच

प्‍यार से लबरेज़ है ।

तब कहो कि विद्रोह न्‍यायसंगत है

अन्‍याय के विरुद्ध ।

युद्ध को आमंत्रण दो

मुर्दा शान्ति और कायर-निठल्‍ले विमर्शों के विरुद्ध ।

चट्टान के नीचे दबी पीली घास

या जज्‍ब कर लिये गये आँसू के क़तरे की तरह

पिता के सपनों

और माँ की प्रतीक्षा को

और हाँ, कुछ टूटे-दरके रिश्‍तों और यादों को भी

रखना है साथ

जलते हुए समय की छाती पर यात्रा करते हुए

और तुम्‍हें इस सदी को

ज़ालिम नहीं होने देना है ।

रक्‍त के सागर तक फिर पहुँचना है तुम्‍हें

और उससे छीन लेना है वापस

मानवता का दीप्तिमान वैभव,

सच के आदिम पंखों की उड़ान,

न्‍याय की गरिमा

और भविष्‍य की कविता

अगर तुम युवा हो ।

___________________

अगर तुम युवा हो
जहाँ स्‍पन्दित हो रहा है बसन्‍त

हिंस्र हेमन्‍त और सुनसान शिशिर में

वहाँ है तुम्‍हारी जगह

अगर तुम युवा हो!

जहाँ बज रही है भविष्‍य-सिम्‍फ़नी

जहाँ स्‍वप्‍न-खोजी यात्राएँ कर रहे हैं

जहाँ ढाली जा रही हैं आगत की साहसिक परियोजनाएँ,

स्‍मृतियाँ जहाँ ईंधन हैं,

लुहार की भाथी की कलेजे में भरी

बेचैन गर्म हवा जहाँ ज़ि‍न्‍दगी को रफ़्तार दे रही है,

वहाँ तुम्‍हें होना है

अगर तुम युवा हो!

जहाँ दर-बदर हो रही है ज़ि‍न्‍दगी,

जहाँ हत्‍या हो रही है जीवित शब्‍दों की

और आवाज़ों को कैद-तनहाई की

सजा सुनायी जा रही है,

जहाँ निर्वासित वनस्पितियाँ हैं

और काली तपती चट्टानें हैं,

वहाँ तुम्‍हारी प्रतीक्षा है

अगर तुम युवा हो!

जहाँ संकल्‍पों के बैरिकेड खड़े हो रहे हैं

जहाँ समझ की बंकरें खुद रही हैं

जहाँ चुनौतियों के परचम लहराये जा रहे हैं

वहाँ तुम्‍हारी तैनाती है

अगर तुम युवा हो।

___________________

अगर तुम युवा हो
चलना होगा एक बार फिर

बीहड़, कठिन, जोखिम भरी सुदूर यात्रा पर,

पहुँचना होगा उन ध्रुवान्‍तों तक

जहाँ प्रतीक्षा है हिमशैलों को

आतुर हृदय और सक्रिय विचारों के ताप की।

भरोसा करना होगा एक बार

विस्‍तृत और आश्‍चर्यजनक सागर पर।

उधर रहस्‍यमय जंगल के किनारे

निचाट मैदान के अँधेरे छोर पर

छिटक रही हैं जहाँ नीली चिंगारियाँ

वहाँ जल उठा था कभी कोई हृदय

राहों को रौशन करता हुआ।

उन राहों को ढूँढ निकालना होगा

और आगे ले जाना होगा

विद्रोह से प्रज्‍ज्‍वलित हृदय लिए हाथों में

सिर से ऊपर उठाये हुए,

पहुँचना होगा वहाँ तक

जहाँ समय टपकता रहता है

आकाश के अँधेरे से बूँद-बूँद

तड़ि‍त उजाला बन।

जहाँ नीली जादुई झील में

प्रतिपल काँपता रहता अरुण कमल एक,

वहाँ पहुँचने के लिए

अब महज अभिव्‍यक्ति के नहीं

विद्रोह के सारे ख़तरे उठाने होंगे,

अगर तुम युवा हो।

___________________

अगर तुम युवा हो
गूँज रही हैं चारो ओर

झींगुरों की आवाजें।

तिलचिट्टे फदफदा रहे हैं

अपने पंख।

जारी है अभी भी नपुंसक विमर्श।

कान मत दो इन पर।

चिन्‍ता मत करो।

तुम्‍हारे सधे कदमों की धधक से

सहमकर शान्‍त हो जायेंगे

अँधेरे के सभी अनुचर।

जियो इस तरह कि

आने वाली पीढ़ि‍यों से कह सको —

‘हम एक अँधेरे समय में  पैदा हुए

और पले-पढ़े

और लगातार उसके खिलाफ सक्रिय रहे’

और तुम्‍हें बिल्‍कुल हक होगा

यह कहने का बशर्ते कि

तुम फैसले पर पहुँच सको

बिना रुके, बिना ठिठके।

मत भूलो कि देर से फैसले पर पहुँचना

आदमी को बूढ़ा कर देता है।

जीवन के प्‍याले से छककर पियो

और लगाओ चुनौती भरे ठहाके

पर कभी न भूलो उनको

जिनके प्‍याले खाली हैं।

आश्‍चर्यजनक हों तुम्‍हारी योजनाएँ

पर व्‍यावहारिक हों।

सागर में दूर तक जाने की

बस ललक भर ही न हो,

तुम्‍हारी पूरी जिन्‍दगी ही होनी चाहिए

एक खोजी यात्रा।

सपने देखने की आदत

बनाये रखनी होगी

और मुँह अँधेरे जागकर

सूरज की पहली किरण के साथ

सक्रिय होने की आदत भी

डाल लेनी होगी तुम्‍हें।

कुछ चीजें धकेल दी गयी हैं

अँधेरे में।

उन्‍हें बाहर लाना है,

जड़ों तक जाना है

और वहीं से ऊपर उठना है

टहनियों को फैलाते हुए

आकाश की ओर।

सदी के इस छोर से

उठानी है फिर आवाज

‘मुक्ति’ शब्‍द को

एक घिसा हुआ सिक्‍का होने से

बचाना है।

जनता को सुषुप्‍त-अज्ञात मेधा तक जाना है

जो जड़-निर्जीव चीजों को

सक्रिय जीवन में रूपा‍न्‍तरित करेगी

एक बार फिर।

जीवन से अपहृत चीजों की

बरामदगी होगी ही एक न एक दिन।

आकाश को प्राप्‍त होगा

उसका नीलापन,

वृक्षों को उनका हरापन,

तुषारनद को उसकी श्‍वेताभा

और सूर्योदय को उसकी लाली

तुम्‍हारे रक्‍त से,

अगर तुम युवा हो।

___________________

अगर तुम युवा हो

जब तुम्‍हें होना है

हमारे इस ऊर्जस्‍वी, सम्‍भावनासम्‍पन्‍न,

लेकिन अँधेरे, अभागे देश में

एक योद्धा शिल्‍पी की तरह

और रोशनी की एक चटाई बुननी है

और आग और पानी और फूलों और पुरातन पत्‍थरों से

बच्‍चों का सपनाघर बनाना है,

तुम सुस्‍ता रहे हो

एक बूढ़े बरगद के नीचे

अपने सपनों के लिए एक गहरी कब्र खोदने के बाद।
तुम्‍हारे पिताओं को उनके बचपन में

नाजिम हिकमत ने भरोसा दिलाया था

धूप के उजले दिन देखने का,

अपनी तेज रफ्तार नावें

चमकीले-नीले-खुले समन्‍दर में दौड़ाने का।

और सचमुच हमने देखे कुछ उजले दिन

और तेज़ रफ्तार नावें लेकर

समन्‍दर की सैर पर भी निकले।

लेकिन वे थोड़े से उजले दिन

बस एक बानगी थे,

एक झलक मात्र थे,

भविष्‍य के उन दिनों की

जो अभी दूर थे और जिन्‍हें तुम्‍हें लाना है

और सौंपना है अपने बच्‍चों को।

हमारे देखे हुए उजले दिन

प्रतिक्रिया की काली आँधी में गुम हो गये दशकों पहले

और अब रात के दलदल में

पसरा है निचाट सन्‍नाटा,

बस जीवन के महावृतान्‍त के समापन की

कामना या घोषणा करती बौद्धिक तांत्रिकों की

आवाजें सुनायी दे रही हैं यहाँ-वहाँ

हम नहीं कहेंगे तुमसे

सूर्योदय और दूरस्‍थ सुखों और

सुनिश्चित विजय

और बसन्‍त के उत्‍तेजक चुम्‍बनों के बारे में

कुछ बेहद उम्‍मीद भरी बातें

हम तुम्‍हें भविष्‍य के प्रति आश्‍वस्‍त नहीं

बेचैन करना चाहते हैं।

हम तुम्‍हें किसी सोये हुए गाँव की

तन्द्रिलता की याद नहीं,

बस नायकों की स्‍मृतियाँ

विचारों की विरासत

और दिल तोड़ देने वाली पराजय का

बोझ सौंपना चाहते हैं

ताकि तुम नये प्रयोगों का धीरज सँजो सको,

आने वाली लड़ाइयों के लिए

नये-नये व्‍यूह रच सको,

ताकि तुम जल्‍दबाज़ योद्धा की ग़लतियाँ न करो।
बेशक थकान और उदासी भरे दिन

आयेंगे अपनी पूरी ताकत के साथ

तुम पर हल्‍ला बोलने और

थोड़ा जी लेने की चाहत भी

थोड़ा और, थोड़ा और जी लेने के लिए लुभायेगी,

लेकिन तब ज़्ररूर याद करना कि किस तरह

प्‍यार और संगीत को जलाते रहे

हथियारबंद हत्‍यारों के गिरोह

और किस तरह भुखमरी और युद्धों और

पा‍गलपन और आत्‍महत्‍याओं के बीच

नये-‍नये सिद्धान्‍त जनमते रहे

विवेक को दफनाते हुए

नयी-नयी सनक भरी विलासिताओं के साथ।

याद रखना फिलिस्‍तीन और इराक को

और लातिन अमेरिकी लोगों के

जीवन और जंगलों के महाविनाश को,

याद रखना सबकुछ राख कर देने वाली आग

और सबकुछ रातोरात बहा ले जाने वाली

बारिश को,

धरती में दबे खनिजों की शक्ति को,

गुमसुम उदास अपने देश के पहाड़ों के

नि:श्‍वासों को,

ज़‍हर घोल दी गयी नदियों के रुदन को,

समन्‍दर किनारे की नमकीन उमस को

और प्रतीक्षारत प्‍यार को।

एक गीत अभी खत्‍म हुआ  है,

रो-रोकर थक चुका बच्‍चा अभी सोया है,

विचारों को लगातार चलते रहना है

और अन्‍तत: लोगों के अन्‍तस्‍तल तक पहुँचकर

और अनन्‍त कोलाहल रचना है

और तब तक,

तुम्‍हें स्‍वयं अनेकों विरूपताओं

और अधूरेपन के साथ

अपने हिस्‍से का जीवन जीना है

मानवीय चीजों की अर्थवत्‍ता की बहाली के लिए

लड़ते हुए

और एक नया सौन्‍दर्यशास्‍त्र रचना है।
तुम हो प्‍यार और सौन्‍दर्य और नैसर्गिकता की

निष्‍कपट कामना,

तुम हो स्‍मृतियों और स्‍वप्‍नों का द्वंद्व,

तुम हो वीर शहीदों के जीवन के वे दिन

जिन्‍हें वे जी न सके।

इस अँधेरे, उमस भरे कारागृह में

तुम हो उजाले की खि‍ड़कियाँ,

अगर तुम युवा हो!

राजनीति से तटस्थ बुद्धिजीवियो

एक न एक दिन
मेरे देश के

राजनीति से तटस्थ बुद्धिजीवियों

से, आम लोगों द्वारा

जवाब तलब किया जायेगा

 

पूछा जाएगा

क्या कर रहे थे वे

जब हमारा देश

मर रहा था धीमे-धीमे 

पीछे छोड़ दी गई पिछले शाम के डेरे की 

छोटी सी बुझती आग की तरह
कोई उनसे उनके लिबास

या लंच के बाद की 

लम्बी दोपहरिया नींद

के मुतल्लिक नहीं पूछेगा,

कोई नहीं जानना चाहेगा

‘शून्य’ के ख़िलाफ़ उनके 

अमूर्त, निर्वीर्य विद्रोह के बारे में,

या, उनकी दार्शनिक मीमांसा भरी 

धनार्जन पद्धति के बारे में;

उनसे कोई नहीं पूछेगा 

ग्रीक मिथकों पर, 

न ही उनकी उस आत्म – ग्लानि पर

जो उन्होंने महसूस की थी 

जब उनके भीतर का जमीर 

एक कायराना मौत

मर रहा था
कोई नहीं जानना चाहेगा

खुद की दोषमुक्ति के 

झूठ के साये में जन्में

उनके बेजा-बेहूदे तर्क

 

उस दिन वे साधारण लोग आयेंगे..

जिन्हें इन राजनीति-तटस्थ लोगों की

किताबों और कविताओं में

कभी जगह तक नहीं मिली
मगर जो उन्हें हर दिन पहुँचाते थे 

उनकी डबलरोटी और दूध. 

अण्डे और टॉर्टिला;

उनके कपडे रफू करते थे,  

उनकी गाड़ियाँ चलाते थे,

वे जिन्होंने इनके बगीचे सँवारे,

पालतू कुत्ते टहलाए,

और बहुत से काम किए;
और वे पूछेंगे,

”क्या किया उस वक्त तुमने

जब गरीब दुख भोग रहे थे?

जब उनके जीवन से 

कोमलता और जिजीविषा चुक रहे थे?”
मेरे प्यारे देश के

राजनीति से तटस्थ बुद्धिजीवियों, तब

तुम्हारे पास कहने के लिए कुछ न होगा
खामोशी के गिद्ध

तुम्हारी आँतें निगल जाएंगे

तुम्हारे अपने विषाद

तुम्हारी आत्मा को चबा जाएंगे

और तुम खुद अपनी शर्म से 

गूँगे हो जाओगे!

-B.K. Chaurasia

नोटबंदी का एक साल, मोदी के तर्क रातोरात बदलते गए

पिछले साल आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि आधी रात से क़रीब 90 प्रतिशत नोट बेकार हो जाएंगे.

इस पहल को ग़लती से ‘नोटबंदी’ कहा गया और तबसे यही चल रहा है.

मोदी ने 500 और 1,000 रुपए के नोटों को रद्द कर दिया था और इसकी जगह 500 और 2,000 रुपए के नए नोटों को जारी किया था. तकनीकी तौर पर देखें तो ये ‘नोटबंदी’ नहीं, बल्कि ‘नोटबदली’ थी.

इस क़दम का एक अरब से अधिक लोगों पर असर पड़ा. 2016 में हुई इस भारतीय नोटबंदी को हाल के इतिहास में किसी भी देश के सबसे अधिक असर डालने वाले आर्थिक नीतिगत फ़ैसले में शुमार किया जाएगा.

आठ नवंबर को अपने भाषण में मोदी ने कहा था कि नोटबंदी के फ़ैसले के पीछे तीन कारण थे- काले धन को समाप्त करना, जाली नोटों की समस्या को हल करना और ‘आतंकवाद’ के आर्थिक स्रोतों को बंद करना. इस घोषणा के दूसरे दिन सुबह ही मोदी जापान की यात्रा पर निकल गए थे. जब वो लौटे तब तक यहां काफ़ी हंगामा मच चुका था.

नक़दी का संकट

अपने पैसे निकालने के लिए बैंकों के एटीएम के आगे लोग लंबी लंबी लाइनें लगी हुई थीं. लाखों परिवारों के पास नक़दी ख़त्म हो गई थी. शादियां रद्द कर दी गईं, छोटे दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं और आर्थिक गतिविधि बाधित हो गई थी.

नक़दी का संकट खड़ा हो गया था. स्टैंड अप कॉमेडियन इन हालातों पर नई नई पैरोडी बना रहे थे.

इस बात से किसी को हैरान नहीं होना चाहिए था, क्योंकि भारत में 95 प्रतिशत ग्राहक लेन देन नक़दी में ही होते हैं.

जापान से लौटने के तुरंद बाद मोदी ने इस मसले पर लोगों को संबोधित किया. इस बार उन्होंने दावा किया कि भारत को ‘कैशलेस और डिजिटल अर्थव्यवस्था’ की ओर ले जाने के लिए नोटबंदी ज़रूरी थी. जापान से वापसी के बाद, नोटबंदी पर मोदी ने अपने भाषणों में ‘कैशलेस और डिज़िटल’ शब्द का जितनी बार इस्तेमाल किया, वो इन भाषणों में ‘काला धन’ शब्द से तीन गुना अधिक थे. जबकि आठ नवंबर के अपने संबोधन में उन्होंने ‘कैशलेस और डिज़िटल’ शब्द का नाम तक नहीं लिया था.

बदलते बयान

कुछ ही हफ़्तों में नोटबंदी, अघोषित धन को ख़त्म करने की कोशिश से, एक ऐसी जादुई छड़ी में बदल गई, जो ग़रीबी से त्रस्त राष्ट्र को सीधे ‘कैशलेस अर्थव्यवस्था’ में तब्दील कर देगी.

ये साहस प्रशंसनीय भी था और हास्यास्पद भी.

विडंबना ये है कि मोदी ने नोटबंदी की घोषणा के तुरंत बाद जिस जापान की यात्रा पर निकल गए थे, वहां जीडीपी के तुलना में नक़दी का अनुपात, विश्व की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक है. ये साफ़ नहीं है कि विकासशील भारत को ‘कैशलेस अर्थव्यवस्था’ की ओर ले जाने की कोशिश, क्यों अचानक प्राथमिकता में आ गई. बयान में ये बदलाव तो लाजमी था क्योंकि नोटबंदी के पीछे जो तीन कारण गिनाए गए थे, वो कहीं पहुंचते नहीं दिख रहे थे. नोटबंदी से काला धन ख़त्म नहीं हुआ. तमाम शोध और अध्ययनों से ये बात साफ़ थी कि भारत में कुल काला धन का केवल 6 प्रतिशत ही नक़दी के रूप में मौजूद था.

तर्क गुमराह करने वाले?

इसलिए, छह प्रतिशत ग़ैरक़ानूनी धन को पकड़ने के लिए 90 प्रतिशत वोटों को रद्द करना, साफ़ तौर पर एक मख्खी को मारने के लिए हथौड़े के इस्तेमाल जैसा मामला था.

जाली नोटों पर शिकंजा कसने का तर्क भी गुमराह करने वाला था क्योंकि भारत के केंद्रीय बैंक ने ख़ुद अनुमान लगाया था कि अर्थव्यवस्था में केवल 0.02 प्रतिशत नोट ही जाली थे.

जाली नोटों की समस्या सभी जगह और हर समय की समस्या है, जिससे निपटने के लिए नोटों के डिज़ाइन में बदलाव किया जाता है न कि नोटबंदी की जाती है. नोटबंदी के पक्ष में मोदी का तीसरा तर्क था कि भारत में अधिक मूल्य के नोटों की संख्या बहुत अधिक थी, जिससे चरमपंथियों को आर्थिक मदद और सुलभ हो गई. ये तर्क भी धोखे में डालने वाला था. भारत में उच्च मूल्य के नोटों की संख्या, जीडीपी के अनुपात में ही बढ़ रही थी. लगभग आधे दशक तक जीडीपी की तुलना में इन नोटों का अनुपात (9%) क़रीब स्थिर था. इसके अलावा, इस बात के कोई सबूत नहीं है कि अधिक मूल्य के नोटों के बढ़ने के साथ-साथ, चरमपंथी घटनाओं में भी बढ़ोत्तरी हुई थी.

सटीक आंकलन नहीं

ये ज़ाहिर था कि नोटबंदी के लिए दिए जा रहे आर्थिक तर्क बहुत अच्छे नहीं थे, लेकिन शायद कोई ऐसा वाज़िब कारण भी रहा हो, जिसके चलते इतनी बड़ी पहल ली गई.

चूंकि इसके पीछे का तर्क अब भी साफ़ नहीं है, इसलिए नोटबंदी की कितनी क़ीमत अदा करनी पड़ी, उसकी भी कोई सटीक जानकारी नहीं है.

अर्थव्यवस्था के सुस्त होने लेकर काफ़ी हंगामा रहा है और नोटबंदी के कारण नौकरियों के जाने को लेकर कई रिपोर्ट और सर्वे भी आए.

हालांकि सुर्खियों में आने वाले जीडीपी के आंकड़ों के आधार पर इस तरह के नतीजे निकालना थोड़ा मुश्किल है.

इमेज कॉपीरइटREUTERS

नक़दी के संकट को लेकर सबसे अधिक प्रभावित होने वाले जो तीन क्षेत्र हैं और भारत के सकल मूल्य वृद्धि यानी ग्रास वैल्यू एडेड (जीवीए) में जिनकी आधे की हिस्सेदारी है और जो कुल तीन चौथाई रोज़गार पैदा करते हैं, वे हैं- कृषि, मैन्युफ़ैक्चरिंग और निर्माण.

जीवीए ये बताता है कि माल उत्पादन और सेवा क्षेत्र से कुल कितना धन पैदा हुआ.

अलग-अलग क्षेत्रों के जीवीए डेटा का इस्तेमाल करें तो मेरा विश्लेषण कहता है कि नोटबंदी के पहले चार तिमाही में इन क्षेत्रों की न्यूनतम वृद्धि दर 8 प्रतिशत थी. न्यूनतम वृद्धि दर वो होती है जिसमें मंहगाई को शामिल नहीं किया जाता.

नोटबंदी के बाद के दो तिमाही में ये वृद्धि दर घट कर औसतन 4.6 प्रतिशत पर आ गई.

वृद्धि दर में इस गिरावट को देखते हुए कोई भी ये अनुमान लगा सकता है कि इन तीन क्षेत्रों में आर्थिक आउटपुट पर नोटबंदी का क्या संभावित असर पड़ा होगा. ये लगभग 15 अरब डॉलर के आस पास बैठता है, जोकि जीडीपी का 1.5 प्रतिशत है. ये भी बहुत मोटा अनुमान है, लेकिन नोटबंदी के बाद नौकरियों के ख़त्म होने की कहानी की एक तस्वीर दिखाता है क्योंकि ये क्षेत्र ही सबसे अधिक नौकरी पैदा करते हैं.

अनचाहे फ़ायदे

लेकिन नोटबंदी के कारण कुछ ऐसे लाभ रहे हैं जिनकी उम्मीद नहीं की गई थी. बैंक पैसों से लबालब भर गए. इसकी वजह से ब्याज़ दरों को कम किए रखने में मदद मिली. और सबसे महत्वपूर्ण कि, इसने भारत के सबसे ऋणग्रस्त सरकारी बैंकों को सरकारी पैकेज देने में मदद की, जिसे रिकैपिटलाइजेशन यानी बैंकों में सरकार की ओर से पूंजी निवेश करना कहा जाता है. इसके अलावा डिज़िटल लेनदेन में भी बढ़ोतरी हुई और ये तर्क दिया जाता रहा है कि भारत नक़दी पर कम से कम निर्भर रहने वाला देश बन जाएगा, हालांकि अभी इस बारे में बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता. कुल मिलाकर कहें तो नोटबंदी कथा का अभी अंत नहीं हुआ है. इसने अर्थव्यवस्था पर चौतरफ़ा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नुक़सान किया है जिसकी जानकारियां सामने आने में लंबा समय लगेगा. 

और इससे भी बुरा ये कि हम अभी तक ये भी नहीं जानते कि इस बड़े फ़ैसले के पीछे ठीक-ठीक क्या कारण थे या इसे इसे लागू करने का क्या तौर तरीक़ा अपनाया गया. हम केवल ये उम्मीद कर सकते हैं कि अन्य विकासशील देश भारत के अनुभव से सबक लेंगे और आर्थव्यवस्था के संबंध में कोई नीति बनाने में और बारीक़ ध्यान रखेंगे.

BHU की छात्राओं से घबराये संघी फासीवादी

​बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्राओं से घबराये संघी फासीवादी-

गौरतलब है कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की कुछ छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटना के बाद भी प्रशासन ने जब कोई कार्यवाही नहीं की तो वहां की छात्राओं ने सड़क पर उतरने की ठानी। पिछले दो दिन से आन्‍दोलन को तोड़ने की तमाम कोशिशों के बावजूद छात्राएं डटी हुई हैं। उनके हॉस्‍टलों पर ताले लगा दिये गये हैं, चारों तरफ पुलिस, आरएएफ बिठा दी गयी है पर फिर भी उनके हौंसले बुलंद हैं। इसी दौरान बीएचयू में मोदी का भी दौरा था। इसी का बहाना बनाकर तमाम संघी इस आन्‍दोलन को बदनाम करने में जुट गये हैं। इस आन्‍दोलन के बारे में दो छोटे पोस्‍ट नीचे दिये हैं। पहला कमेंट मुकेस असीम का है। दूसरा दिशा छात्र संगठन व स्त्री मुक्ति लीग, इलाहाबाद द्वारा जारी पर्चा है। 

1. बीएचयू की छात्राओं द्वारा यौन अपराधियों के खिलाफ आंदोलन को एबीवीपी जब मोदी विरोधी आंदोलन बताता है तो वह यह सच्चाई ही बयान कर रहा होता है कि मोदी-योगी, आदि की संघी सरकारें खुद को पितृसत्ता से लेकर तमाम प्रतिक्रियावादी विचारों के वाहक ब्राह्मणवादी विचार के लम्पटों-लुच्चों का संरक्षक मानती हैं; और उनके विरोध को अपना विरोध|

यही वजह है कि बीएचयू का वाइस चांसलर पूरी बेशर्मी और प्रशासनिक ताकत के साथ लम्पटों, अपराधियों के साथ खड़ा है, अपराध की शिकार छात्रा के साथ झूठी हमदर्दी तक व्यक्त करने को तैयार नहीं है बल्कि उसे ही अपराध के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है, और विरोध में बहादुरी से डटीं छात्राओं (और छात्रों) पर हर तरह के दबाव-डराने-धमकाने के साथ ही दमन की भी तैयारी है| हॉस्टलों पर ताले लगा दिए गए हैं, पीने के पानी के नल और शौचालय पर ताला लगा दिया गया है| 

साफ है कि कि ये हिन्दुत्वी लम्पट भी भारतीय विश्वविद्यालयों का वही हाल करना चाहते हैं जो ईरानी कठमुल्लाओं ने तेहरान और तालिबानियों ने काबुल विवि का किया था| पर हैदराबाद, दिल्ली, जेएनयू, मद्रास आईआईटी, जादवपुर, पंजाब (चंडीगढ़) से बीएचयू तक छात्र भी बता रहे हैं कि ऐसा नहीं होने दिया जायेगा|

साथियो! बी.एच.यू. में एक छात्रा के साथ छेड़खानी की घटना के बाद बी.एच.यू की छात्राओं ने जिस तरह से जुझारू संगठित प्रतिरोध को जन्म दिया है वो एक मिसाल है। यह प्रतिरोध चढ्ढीधारी कुलपति और उसकी सरपरस्ती में पलने वाले लम्पटों के मुँह पर एक करारा तमाचा है जो छात्राओं के साथ होने वाली बदसलूकियों के लिए छात्राओं को ही ‘‘संस्कार’’ और ‘‘चरित्र’’ का पाठ पढ़ाते हैं।
वास्तव में छात्राओं का फूट पड़ा ये आक्रोश गुण्डागर्दी-लम्पटई व प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ़ अरसे से इकट्ठा हुये गुस्से की अभिव्यक्ति है। बी.एच.यू. में यौन हिंसा और महिला विरोधी अपराधों को आलम यह है कि एक लड़की का रेप होता है और प्रशासन अपराधियों पर कार्यवाही करने के बजाय लड़की को ही मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर देता है। जब ‘नवीन गर्ल्स हॉस्टल’ की लड़कियाँ हॉस्टल की खिड़कियों के सामने खड़े लम्पट लड़कों की गन्दी हरकतों की शिकायत करती हैं तो वार्डन महोदया कहती हैं कि खिड़कियाँ बन्द कर लो। एक अन्य शिकायत पर प्रॉक्टोरियल बोर्ड का एक कर्मचारी छात्रा से कहता है कि-‘आप हॉस्टल जायेंगी या रेप होने का इंतजार करेंगी।’ 

अब जब छात्राओं ने आन्दोलन का रास्ता पकड़ा तो सनातनी मूल्यों का ठेकेदार बना बी.एच.यू प्रशासन, वी.सी. के नेतृत्व में प्रॉक्टोरियल बोर्ड, मनुवादी छात्रों का गुण्डा गिरोह, सत्ता के तलवाचाट अखबार व चैनलों की झूठी रिपोर्टिंग, ज़रूरत पड़ी तो पुलिस इस आन्दोलन को कुचलने के लिए तैयार है। 

हमें इससे यह भी समझ लेना चाहिए कि हमें संगठित होने और इस आन्दोलन को सतत आगे ले जाने की ज़रूरत है। क्योंकि शासन-प्रशासन कभी भी हमारे साथ नहीं खड़ा होने वाला। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का जुमला फेंकने वाले जुमलेन्द्र बनारस में मौजूद थे। लेकिन इतनी बड़ी घटना पर चूँ तक नहीं किये। 

स्त्रियों के उत्पीड़न की घटनाओं के खि़लाफ़ हमें संगठित होकर एक हाथ से पितृसत्ता का गर्दन दबोचना होगा दूसरे हाथ से मौजूदा व्यवस्था का, जो पितृसत्ता को निरन्तर खाद पानी देने का काम रहती है। हमें अपने आन्दोलन को सही दिशा देना होगा, संगठित होना होगा और स्त्री उत्पीड़न के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष को व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई से जोड़ देना होगा।

ब्राह्मणवाद

एक भाई ने मुझसे पूछा है ” ब्राह्मणवाद का क्या अर्थ है ? मैं भी ब्राह्मण हूँ इसलिये जानना चाहता हूँ ? ”

उस भाई की जिज्ञासा के प्रश्न का उत्तर अपनी समझ से देने की कोशिश कर रहा हूँ ၊

भारत का समाज जातियों में बंटा हुआ समाज है ၊

भारत में जाति व्यवस्था ने आबादी के बड़े हिस्से को हीन और नीच घोषित किया ,

मनु द्वारा घोषित नियम के अनुसार इस नीच घोषित किये गये आबादी के हिस्से की ज़मीने छीन ली गईं ,

आबादी के इस हिस्से पर धन कमाने की मनाही थोपी गई,

आबादी के इस हिस्से को राजनैतिक तौर पर कमज़ोर रखा गया ၊

यानी आज के दलितो को एक घोषित विधान के अनुसार गरीब , कमज़ोर और नीचा बनाया गया ၊

आबादी के बड़े हिस्से को नीच घोषित करने का काम किया सनातन धर्म ने ၊

सनातन धर्म का विधान बनाया वेद, शास्त्र और पुराण लिखने वाले ब्राह्मणों ने,

तो जाति प्रथा का निर्माण किया ब्राह्मणों ने,

तो ब्राह्मणवाद यानि जाति प्रथा,

आज भी ब्राह्मणों द्वारा रचित सनातन धर्म को ही बढ़ाया जा रहा है,

भारत की राजनीति भी सनातन धर्म के प्रतीकों की रक्षा के नाम पर चल रही है,

राम मन्दिर, भारतीय संस्कृति, जो असल में ब्राहमणवादी संस्कृति है, की रक्षा का संकल्प के नाम पर चुनाव जीते जा रहे हैं ၊

इसलिये आज शूद्र और दलित जातियाँ कहती हैं कि उनकी लड़ाई ब्राह्मण वाद के विरुद्ध है,

अर्थात ब्राह्मणों द्वारा जिन करोड़ों लोगों को नीच, हीन और गरीब बनाया गया,

वह खुद को हीन घोषित करने वाले नियम और वाद से मुक्ति चाहते हैं ၊

तो यह बिल्कुल जायज़ बात है ၊

खुद को बुरी स्थिति मे ले जाने वाली व्यवस्था से विद्रोह करना और उस व्यवस्था का नाश करना,

हर मनुष्य का नैसर्गिक कर्तव्य है ,

इसलिये करोड़ों इंसानों को बुरी स्थिति में धकेलने वाले ब्राह्मणवादी कानूनों का नाश करने की कोशिश करना,

हर न्यायप्रिय व्यक्ति का कर्तव्य होना चाहिये,

इसलिये अगर आज कोई व्यक्ति ब्राह्मणवाद का समर्थन करता है तो इसका अर्थ है वह करोड़ों लोगों को नीच घोषित करने को सही कह रहा है ၊

और यदि आज के दौर मे कोई करोड़ों लोगों को नीच घोषित करने का समर्थन कर रहा है,

तो वह लोकतन्त्र, संविधान, कानून, नैतिकता और इंसानियत के विरुद्ध बात कर रहा है ၊

इसके अलावा भारत मे ब्राह्मणों द्वारा पूर्व में नीच घोषित किये गये करोड़ों लोग आज भी व्यापार, प्रशासन, शासन, न्यायिक सेवा, विश्वविद्यालयों के उच्च पदों पर आरक्षण के बावजूद नहीं पहुंच पा रहे हैं,

इसका यह कारण नहीं है कि यह दलित योग्य नहीं है,

बल्कि इसका कारण यह है कि सैंकड़ों सालों से ऊंचे पदों पर कब्ज़ा किये बैठे ताकतवर ब्राह्मणों का वर्ग इन दलितों से आज भी नफरत करता है,

और इन दलितों को इन पदों से दूर रखने की कोशिशें करता रहता है ၊

इस तरह दलित युवा मानता है कि उसे हीन हालात से निकलने देने में ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण वर्ग बाधा है,

देश मे सामाजिक न्याय के पक्षधर भी मानते हैं कि ब्राह्मणवाद द्वारा रचित जातिवाद एक न्याय युक्त समाज बनाने मे बाधा है,

इसलिये सभी न्यायप्रिय लोग ब्राह्मणवाद के खात्मे के पक्ष मे हैं,

इसके अलावा ब्राह्मणवाद द्वारा निर्मित जातिवाद चूंकि यह मानता है कि जाति जन्म से मिलती है,

और जाति कभी बदल नहीं सकती,

ब्राह्मणवाद मानता है व्यक्ति जिस जाति मे जन्म लेता है , वह उसी जाति मे मरता है,

इसलिये ब्राह्मणवाद के नाश का अर्थ है जाति को जन्म से जोड़ने वाले धर्म का नाश ,

इसलिये जो ब्राहमण जाति के व्यक्ति जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के नाश के द्वारा सामाजिक न्याय के लिये कोशिश कर रहे हैं,

ऐसे लोगों को ब्राहमण मान कर उनसे नफरत करना भी ब्राह्मणवाद है,

ज्ञान को श्रम से श्रेष्ठ मानना ब्राह्मणवाद है,

यह मानना कि शरीर से श्रम करने वाला हीन होता है,

और बुद्धि से काम करने वाला उच्च होता है, यह भी ब्राह्मणवाद है ၊

यह मानना कि अंग्रेजी जानने वाले, ऊँची शिक्षा पा गये लोग, शहरों में रहने वाले लोग श्रेष्ठ हैं,

यह मानना कि अंग्रेज़ी ना जानने वाले, ऊंची शिक्षा ना पा सके लोग, गांव के लोग हीन है, भी ब्राह्मणवाद है,

ब्राह्मण जाति के अलावा, अन्य जाति मे पैदा होने के बावजूद इंसानों को जन्म के स्थान, शिक्षा और आर्थिक स्थिति के आधार पर हीन या श्रेष्ठ मानने वाला व्यक्ति भी ब्राह्मणवादी है।

भारत का सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक बदलाव ब्राह्मणवाद के नाश के बिना संभव ही नहीं है।

जनक्रांति के नायक, पेरियार ई.वी. रामास्वामी नायकर

जब तक भारतीय समाज में जातियों का पदक्रम बना रहेगा तब तक यह संभावना भी रहेगी कि इस पदक्रम की हर सीढ़ी पर खड़ी जाति, अपने से नीची सीढ़ी की जाति का दमन करने का प्रयास करेगी।

-पेरियार ई.वी. रामास्वामी नायकर

आज पेरियार का जन्मदिन है और धर्म के पाखण्ड को उजागर करने का इससे अच्छा दिन और कोई नहीं हो सकता। पेरियार जीवन भर धर्म के पाखण्ड के खिलाफ लड़ते रहे। इरोड वेंकट नायकर रामासामी का जन्म 17 सितम्बर 1879 को तमिलनाडु के इरोड में एक सम्पन्न और  परम्परावादी हिन्दू परिवार में हुआ था। उनके पिता वेंकतप्पा नायडू एक धनी व्यापारी थे। उनकी माता का नाम चिन्ना थायाम्मल था। उनका एक बड़ा भाई और दो बहने थीं। उनकी औपचारिक शिक्षा 1884 में छः वर्ष की अवस्था में आरम्भ हुई, और पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई के बाद अध्ययन छोड़कर उन्हें अपने पिता के व्यवसाय में शामिल होना पड़ा। तब उनकी अवस्था 12 वर्ष की थी। उनका विवाह 1898 में उन्नीस वर्ष की अवस्था में 13 वर्ष की नागम्माल से हुआ, अपनी पत्नी को भी उन्होंने अपने विचारों में दीक्षित किया और पुरानी रूढ़ियों से आजाद कराया। अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने दूसरा विवाह किया उनकी दूसरी पत्नी न उनके काम को आगे बढ़ाने में उनका बहुत सहयोग किया। 24 दिसम्बर 1973 को उनका निधन हो गया।

पेरियार के जीवन की कुछ महत्वपूर्ण बातें:

1904 में पेरियार ने एक ब्राह्मण के भाई को गिरफ्तार करवाने में न्यायालय के अधिकारियों की मदद की जिसका उनके पिता बहुत आदर करते थे। इसके लिए उनके पिता ने उन्हें लोगों के सामने पीटा। इसके कारण कुछ दिनों के लिए पेरियार को घर छोड़ना पड़ा। पेरियार काशी चले गए। वहां निःशुल्क भोज में जाने की इच्छा होने के बाद उन्हें पता चला कि यह सिर्फ ब्राह्मणों के लिए था। ब्राह्मण नहीं होने के कारण वो भोज में शामिल नहीं हो सके इस बात का उन्हें बहुत दुःख हुआ और उन्होंने हिन्दुत्व के विरोध की ठान ली। इसके लिए उन्होने किसी और धर्म को नहीं स्वीकारा और वे हमेशा नास्तिक रहे। इसके बाद उन्होंने  एक मन्दिर के न्यासी का पदभार संभाला तथा जल्द ही वे अपने शहर के नगरपालिका के प्रमुख बन गए। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के अनुरोध पर 1919 में उन्होने कांग्रेस की सदस्यता ली। इसके कुछ दिनों के भीतर ही वे तमिलनाडु इकाई के प्रमुख भी बन गए। 1923 ई. में वायकोम मन्दिरों में हरिजनों के प्रवेश को लेकर इन्होंने ‘आत्म सम्मान’ आन्दोलन चलाया, उनकी पत्नी तथा दोस्तों ने भी इस आंदोलन में उनका साथ दिया।

ई.वी. रामास्वामी तमिल राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे। द्रविड़ आन्दोलन को शुरू करने का श्रेय इन्हीं को जाता है| इनके समर्थक इन्हें पेरियार संबोधन से संबोधित करते थे| इन्होंने सामाजिक समानता पर बल दिया, मनुस्मृति को जलाया तथा ब्राह्मणों के बिना विवाह करवाए। इन्होंने ‘कुदी अरासु’ नामक ग्रंथ लिखा। 1930 ई. में ईश्वर विरोधी समिति के निमंत्रण पर वे रूस गए तथा लौटने के बाद वे काँग्रेस से अलग हो गए एवं द्रविड़ मुनेत्र कडगम की स्थापना की।

धर्म के बारे में पेरियार कहते थे: 

“ईश्वर को धूर्तों ने बनाया, गुंडों ने चलाया और मूर्ख उसे पूजते हैं” पेरियार की मात्रभाषा कन्नड़ थी, लेकिन तमिल और तेलुगु पर भी उन्हें खासा अधिकार था। बचपन से ही वे अपने परिवार में वैष्णव संतों के उपदेश और प्रवचन सुनते आये थे, और धर्म के आधार पर होने वाले शोषण और भेदभाव के मूल कारणों को उन धार्मिक सिद्धांतों में उन्होंने बहुत पहले ही ढूंढ निकाला था। पेरियार बहुत ही तार्किक थे वे हर धार्मिक उपदेश पर तर्क के द्वारा प्रहार कर उसे खंडित करते।

 पेरियार जीवन भर सामाजिक और धार्मिक बुराइयों के खिलाफ लड़ते रहे। आज इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद भी मौजूदा स्थिति को देखते हुए पेरियार उतने ही प्रासंगिक लगते हैं जितने की वो अपने समय में थे। दलित बहुजनों को पेरियार से धर्म की कुरीतियों को तार्किक रूप से कैसे काटें यह सीखने की जरूरत है। अंत में इस क्रान्ति वीर योद्धा को उनके जन्मदिवस पर नमन।